(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.136. अध्यायः 136
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति कोशवृद्ध्यर्थमपहार्यानपहार्यधनविवेचनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 12-136-0x(5723)(70058)
अत्र गाथा ब्रह्मगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः।
येन मार्गेण राजानः कोशं संजनयन्त्युत॥ 12-136-1(70059)
न धनं यज्ञशीलानां हार्यं देवस्वमेव च।
दस्यूनां निष्क्रियाणां च क्षत्रियो हर्तुमर्हति॥ 12-136-2(70060)
इमाः प्रजाः क्षत्रियाणां रक्ष्या हन्याश्च भारत।
थनं हि क्षत्रियस्येह द्वितीयस्य न विद्यते॥ 12-136-3(70061)
तदस्य स्याद्बलार्थं वा धनं यज्ञार्थमेव वा।
अभोज्याश्चौषधीश्छित्त्वा भोज्या एव पचन्त्युत॥ 12-136-4(70062)
यो वै न देवान्न पितृन्न मर्त्यान्हविषाऽर्चति।
अनर्थकं धनं तत्र प्राहुर्धमेविदो जनाः॥ 12-136-5(70063)
हरेत्तद्द्रविणं राजन्धार्मिकः पृथिवीतिः।
न हि न प्रीणयेल्लोकान्न लोके गर्हते नृपम्॥ 12-136-6(70064)
असाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यो यः प्रयच्छति।
आत्मानं संक्रमं कृत्वा मन्ये धर्मविदेव सः॥ 12-136-7(70065)
[तथातथा जयेल्लोकाञ्शक्त्या चैव यथायथा।]
औद्भिदा जन्तवो यद्वच्छ्रुत्वा वाजो यथातथा॥ 12-136-8(70066)
अनिमित्तात्संभवन्ति तथा यज्ञः प्रजायते।
यथैव दंशमशकं यथा कीटपिपीलिकम्॥ 12-136-9(70067)
सैव वृत्तिर्हि यज्ञेषु यथा धर्मो विधीयते॥ 12-136-10(70068)
यथा ह्यकस्माद्भवति भूमौ पांसुस्तृणोलपम्।
तथैवेह भवेद्धर्मः सूक्ष्मः सूक्ष्मतरः स्मृतः॥ ॥ 12-136-11(70069)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 136॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-136-4 औषधीश्छित्त्वा ताभिरिन्धनीकृताभिर्भोज्या व्रीह्याद्याः। दुष्टान् हिंसित्वा साधून्पालयेदिति भावः॥


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